रविवार, अप्रैल 08, 2007

आई रे आई होली ,मस्ती में घूमें लोगों की टोली।

आई रे आई होली ,
मस्ती
में घूमें लोगों की टोली।

रगों से ये दुनिया रगींन है,
बिन
रगं श्याम और श्वेत क्या ज़िदगीं है।

तो भर लो खुशी और प्यार के रगं।
ऐसे
रगों इन ऱगों दुनिया भी रह जाए दगं।

हर तरफ़ रगों की मची है बहार,

भुला के सब मनमुटाव गले लग जाओ य़ारों।

लग के एकदुजे को रगं जोर से बोलो, बुरा मानना होली है।

कवि- विश्वजीत 'सिहँ'

4 comments:

  1. bahut hi sundar sabdo me kavi ne Holi ke tyohar ki vyakhya ki hai. varbhav Bhav bhool kar pyar ke rang jivan me bharne ki prerna di hai.
    Kavi ko dero badhiyan....

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  2. kavi ji , ab ye kavitaye likhni chhod do, ghar-bar sambhalo. apki saadi ho gayi hai , u know.

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